मैं नास्तिक क्यों हूँ ? Why I am an Atheist?


मैं नास्तिक ही पैदा हुआ था… बाकी सब की तरह…

जैसे जैसे सोचने समझने की शक्ति विकसित हुई, तो पता चला कि जीवन आसान नहीं है, हजारों समस्याएं हैं, सबके साथ होती हैं.

और पता चला कि भगवान होते हैं जिन्होंने ये दुनिया बनाई है. भगवान मतलब मेरे परिवार, मेरे धर्म वाले भगवान…

भगवान जो सर्व शक्तिशाली हैं, सर्वत्र व्याप्त हैं, सब से प्रेम करते हैं, सबका भला करते हैं, सब कुछ उन्हीं की इच्छा से ही होता है. उनकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता.

तो मैं भी सबकी तरह, धार्मिक भवनों में जाता था, कोई समस्या आती थी तो सुलझाने के लिए प्रार्थना करता था. कभी मेरी समस्या सुलझ गयी, कभी नहीं भी सुलझी.

फिर पता चला कि और भी बहुत सारे धर्म हैं, और भी बहुत सारे भगवान हैं दुनिया में, जिनके धर्मानुसार अलग अलग नाम हैं. विशेषताएँ लगभग वही हैं जो पिछली लाइन्स में लिखी हैं मैंने.

लेकिन इन सभी धर्मों के अधिकतर लोग एक दूसरे के भगवान को नहीं मानते, और बहुत बार आपस मैं लड़ते मरते रहते हैं.

और सबके अनुसार उनके वाले भगवान ही वास्तविक भगवान हैं, दूसरे वाले नहीं, और कुछ धर्म वालों ने अभियान चला रखे हैं बाकियों को अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए.

अरबों खरबों का व्यापार है इन भगवानों के नाम पर किये जाने वाले रीति रिवाजों का.

कुछ अर्थशास्त्र पढ़ा, कुछ इतिहास, कुछ राजनीति, कुछ विज्ञान, कुछ दर्शन..

समझ मे आया कि जब से मनुष्य का अस्तित्व है, सामाजिक व्यवस्था, मोटे तौर पर, लगभग वैसी ही रही है.

साधन संपन्न और शक्तिशाली वर्ग ने साधनहीन और कमजोर वर्ग का सदैव शोषण किया है, आज भी करते हैं. इस व्यवस्था में किसी बाहरी शक्ति का कोई हस्तक्षेप कभी नजर नहीं आता, जबकि इनमें 90% से ज्यादा लोग अति धार्मिक और भगवान को मानने वाले होते हैं.

भुखमरी, शोषण, हत्या, महामारी, अकाल मृत्यु, प्राकृतिक आपदा, युद्ध इत्यादि का कोई चमत्कारिक समाधान होने का हजारों वर्षों से कोई प्रमाण नहीं है.

ऐसी किसी भी शक्ति का किसी भी प्रकार का कोई प्रमाण कहीं भी उपलब्ध नहीं है.

नास्तिक बना नहीं जाता, वो हम सबकी जन्मजात स्तिथि है.

मैं उसी स्तिथि में बस वापस लौट आया हूँ…

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